When machine thinks like man.. Hindi poem

जब मशीन आदमी सी सोचने लगेगी ,
तब आदमी मशीन से पूछेगा ,
मजा किसमे  है,
मन मशीन का ख़राब है,
तन को तो खतरा नहीं,
वो तो लोहे का बना है,
पहले से ही बहुत है ,
जो आदमी को ,
चैन की नींद नहीं सोने देते ,
नए नए जखम ,
रोज देते है,
पुराने मंदे पड़ते नहीं,
कि  जैसे चोटो  के ,नए नए ,
आयाम उभरते है,
किस का असर कब होता है,
दवा देने वाले कम है,
मशीन शायद ये कमी पूरी करे,
पर क्या मन मान जायेगा ,
यह देखके की ,
उसकी दी हुई चोट ,
उसे लगी नहीं ,
वो तो आदमी सी ,
सोचती है,
पर आदमी जैसे बहकती नहीं,
और सब अर्थो का अर्थ ,
निकल लेती 



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