Hindi poem 29

वहा तक चलेगे हम 
जहाँ तक कदम ले जाये 
मंजिल है बहुत दूर 
चलना ही जीवन है 
खोने को पाना समझो 
पाने को खोना समझो 
क्या पाना और खोना है 
क्या लेकर आये थे 
चलते चलते 
नज़ारे बदलते रहते है 
कुछ पीछे छूटता है 
कुछ आगे आता है 
कुछ साथ चलता है 
कुछ चिपक जाये 
तो अच्छा है 
बाकी तो 
बेरंग जाना है 
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